वक्त जाया कर दिया हमने,
संसार को संभालने में,
ना लोगों ने हमें समझा,
ना जिन्दगी में सुकून मिला,
हमें फकत शिकायतों के,
कुछ हासिल नहीं हुआ।
गैर गाहे-बगाहे काम आ गए,
अपने टांगें खींचने में लगे रहे,
हमने भी हार नहीं मानी,
थककर गिरकर भी चलते रहे,
सफ़र रुका नहीं रोका गया,
आंख दांत आंत जवाब देने लगे,
तब समझ आया,
लौटने का वक्त हो गया है,
सेवा सुमिरन सत्संग ही,
सच्चे साथी हैं साधक के लिए।
- कुलदीप शुक्ला