रोज रोज गिरती मानवता,
अपने आप से शर्मसार हो रही है,
ऐसे लग रहा है जैसे वह,
विलख- विलख कर कह रही है,
अब और मत गिराओ लोगो,
ठहरो रुको अपने गिरेबान झांको।
इस धरा का इस धरा पर,
सब धरा रह जाएगा,
रोटी कपड़ा मकान इनका,
सब कोई रखें ध्यान,
वरना इस लोक के साथ,
परलोक भी बिगाड़ लोगे,
खाली हाथ रह जाओगे।
-कुलदीप शुक्ला