कहने नहीं थे, मग़र फिर भी वो लफ़्ज़ कहने पड़े
मुझे तेरी मुहब्बत के ज़ालिम कई दाग़ सहने पड़े
बेस्वादी रिश्ते फ़क़त कड़वाहट ही नज़र आती हैं
ख़ुद क़ो बिछाकर भी इनके तीखे ताने चखने पड़े
क्या कहें महफिल में चेहरे का नूर किधर खो गया
हमें दर्द छुपाने के भी कई झूठे क़सीदे कसने पड़े
दुश्मन ऐसा कि खून भी खून का यकिं न कर रहा
थक हार के इल्ज़ाम भी हमें ख़ुद पऱ ही धरने पड़े
हादसे कई हुए या कहुँ के हादसों में जिंदगी गुजरी
हमें न चाहते हुए भी उम्र सें पहले तज़ुर्बे पढ़ने पड़े
ख़ुशी तो हासिल न हुई पऱ दर्द के आलम कई हुए
ये जिंदगी ज़ीने के ख़ातिर ज़ख़्मी ज़ुर्माने भरने पड़े
दिली ज़ख्म नहीं देखते,वो बस तल्ख़िया देखते हैं
ऐसो के ख़ातिर कृष्णा फिर दिल सें ख़ून झरने लगे
-कृष्णा शर्मा