कि तुम क्यों नहीं समझते?
क्यों नहीं समझते तुम......
इन हंसी ठिठोलियो के बीच जीवन,
पानी के बुलबुले पर बैठा आदम,
राई-2 पाई-2 जुटाकर
दस्तक देगा महाश्मशान में।
कि तुम क्यों नहीं समझते.......
वर्चस्व,वैभव, विशिष्टता के दौर में,
अंधाधुंध चहलकदमी करते ,
तुम पहुंच रहे हो महाबाजार में,
और इन्हीं बाजारों के बिल्कुल बगल से,
खुलता है मृत्यु लोक का महाद्वार।
कि तुम क्यों नहीं समझते ......
क्यों नहीं समझते तुम.?