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ख़ामोश पिता........

Komal Kumari

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जिस दिन नन्हे हाथों ने
        
                                                    
                            
पहली बार पिता की उँगली थामी,
उसी दिन से उन्होंने
अपनी दुनिया बदल डाली।

खिलौनों से लेकर किताबों तक,
हर ज़िद मुस्कुराकर पूरी की।
अपनी अधूरी ख़्वाहिशों को छोड़,
हर ख़ुशी बच्चों के नाम कर दी।

धूप में ख़ुद जलते रहे,
ताकि आँगन में छाँव बनी रहे।
हर मुश्किल से लड़ते रहे,
ताकि हर सपना साकार हो सके।

बच्चे बड़े होते गए,
और पिता चुप होते गए।
चेहरे की रौनक ढलती गई,
ज़िम्मेदारियाँ बढ़ती गईं।

जिन कंधों पर बैठकर
दुनिया को देखा गया,
एक दिन वही कंधे
थककर झुक गए।

जिन हाथों ने चलना सिखाया,
एक दिन वही हाथ
सहारे के मोहताज हो गए।

अजीब बात है...

बचपन में गिरने पर
पिता तुरंत संभाल लेते थे।
बुढ़ापे में जब पिता लड़खड़ाए,
तो अक्सर बहुत देर हो चुकी थी।

शायद इस दुनिया में
सबसे महँगी ख़ामोशी
एक पिता की ही होती है...

क्योंकि पिता बोलते कम हैं,
पर पूरी उम्र
अपना सब कुछ
अपनों के नाम कर देते हैं।
— कोमल कुमारी
 
3 महीने पहले
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