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वियोग श्रृंगार कविता

Kishni

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            तेरे कल कल गुप्त मौन ने,
        
                                                    
                            
सारी गाथा कह दी है।
ओ पानी की बूंदों तुमको,
किस्से मिलने की जल्दी है।

ये नहीं सत्य की बिना लक्ष्य के
डोली डोली फिरती हो
किसके लिए यूं दौड़ रही हो,
पूछ रहा हूं कौन है वो

तुमने पर्वत का संग छोड़ा,
अपना घर बचपन छोड़ा ।
वो भी तो कुछ छोड़ के आए ,
प्रेमी का कर्तव्य निभाए ।

मैं इस पथ पर घूम चुका हूं,
सो हे तरिणी बोल रहा हूं।
मैं तो हतप्रभ रहा प्रेम से ,
और चकित हूं परिणामों से।

है नियति पहुंचकर मिटना ही है,
तुम भी एक दिन मिट जाओगी।
जिस क्षण सिंधु का आलिंगन होगा,
तुम भी सिंधु हो जाओगी।
एक महीने पहले
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