जो बंधी थी तारें सबमें जंग लग गई
अब रिश्तों की रौशनी फीकी हो गई
जिद्द ख़ज़ाने के मालिक बने किस तरह
चाहे सूली चढ़े अपना ही कोई
वक़्त की नजाकत से बंदा अंजान है
जबकि वक़्त की बेड़ियाँ गले पड़ गई
रुक जाओ अधिक और सितम ना करो
तेरे आंखों की ग़ैरत कहाँ खो गई
बेशक खुलेंगी किवाड़े सभी जुर्म की
रंग बदलने की आदत कहाँ लग गई।
-किरण मिश्रा