विज्ञापन

जबकि वक़्त की बेड़ियाँ गले पड़ गई

Kiran Mishra

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जो बंधी थी तारें सबमें जंग लग गई
        
                                                    
                            
अब रिश्तों की रौशनी फीकी हो गई
जिद्द ख़ज़ाने के मालिक बने किस तरह
चाहे सूली चढ़े अपना ही कोई
वक़्त की नजाकत से बंदा अंजान है
जबकि वक़्त की बेड़ियाँ गले पड़ गई
रुक जाओ अधिक और सितम ना करो
तेरे आंखों की ग़ैरत कहाँ खो गई
बेशक खुलेंगी किवाड़े सभी जुर्म की
रंग बदलने की आदत कहाँ लग गई।
-किरण मिश्रा 
9 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Ankit Kumar

10488 कविताएं

View Profile