"शुगर फ्री सी ज़िन्दगी "
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अपने होकर भी...
पराये..
कुछ व्यर्थ से बन्धनों की...
मर्मान्तक व्यथा......
खुली आँखों.. में.. छिपे..
स्मार्ट...फैन्सी चश्मों के नीचे...
ठहरा.. पथरीला..धुँधलाता..
स्याह इन्तजार...
असह्य पीड़ा को जनती...
वक्त की असीमित परिधि...
सीमा अतिक्रमण के
सीमित दायरे...
सामाजिक उल्लंघनों की चारित्रिक गरिमा...
आवृत्त दर्द....
अनावृत्त..खोखली...हँसी
यही है आज की.. कड़ुवी . .खट्टी...
फीकी ...कसैली..
फिर भी स्वास्थ्य के लिये लाभप्रद.....
आर्टीफिशियल... मीठी...
"शुगर फ्री सी ज़िन्दगी... !!"
- किरण मिश्रा
नोयडा
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