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मिलावट: मानवता पर चोट

KHEMA RAM

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            असर सब ओर छा रहा है,
        
                                                    
                            
मिलावटखोर गुण गा रहा है।
सारे गुण अवगुण में बदले,
क्या और बदलना अब बाकी है?

सारे अनजान, मिलावट की ही खाकी है,
बेईमान, सूदखोरों की यही तो बैसाखी है।
गुणवत्ता की बातें करते हरदम,
क्या यही मानवता है, मेरे हमदम?

दूध, क्षीर, पनीर, खीर सब मिलावटी,
शुद्धता के सारे वादे, इरादे बनावटी।
दवाइयों में भी मिलावट का ज़हर समा रहा है,
दुआओँ पर भी जैसे मिलावट का साया छा रहा है।

तेल, मसाले, घी और मिठाइयाँ,
लाभ की भेंट चढ़ गईं सब अच्छाइयाँ।
स्वाद बचा है केवल, सेहत सच हार गई,
लालच फिर इंसानियत पर भारी पड़ गई।

मिलावट अब केवल वस्तुओं में नहीं,
विचारों और व्यवहारों में भी उतर आई है।
चेहरों पर मुस्कान शेष है,
पर नीयत जाने कहाँ पराई है।

रिश्तों में मिलावट, वचनों में मिलावट,
व्यापार में मिलावट, सपनों में मिलावट।
विश्वास का दीप टिमटिमा रहा है,
ईमान चौराहे पर सिर झुकाए खड़ा है।

कैसा यह विकास, कैसी यह कमाई,
जिसने हर संवेदना कीमत पर चढ़ाई।
कुछ सिक्कों की ख़ातिर जीवन से खेलना,
क्या यही विकास है, मानवता की अवहेलना?

जो ज़हर तुम बाज़ार में बेच रहे हो,
वह किसी मासूम की साँसों तक पहुँचता है।
जो अन्न किसी की थाली में जाता है,
वही किसी माँ की दुआ बनकर लौटता है।

धन कमाओ, पर धर्म न खोओ,
व्यापार करो, पर विश्वास न तोड़ो।
लाभ कम हो जाए तो कोई हानि नहीं,
पर किसी की ज़िंदगी की कीमत पर कमाई महान नहीं।

आओ, फिर से शुद्धता का मान बढ़ाएँ,
ईमानदारी को अपना अभिमान बनाएँ।
न मिलावट करें, न उसे स्वीकार करें,
अपने कर्मों से समाज का उद्धार करें।

जब अन्न शुद्ध होगा, तन भी स्वस्थ होगा,
जब मन शुद्ध होगा, तभी समाज समृद्ध होगा।
असर फिर सत्य का छा जाए,
हर मन शुद्धता को अपनाए।

मिलावट का यह दौर थम जाए,
विश्वास का दीप पुनः जगमगाए।
मानवता फिर मुस्काए हर द्वार,
यही हो जीवन का सच्चा श्रृंगार।
-खेमाराम छापरवाल
3 महीने पहले
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