यूँ तो हजारों बार लिखती हूँ कविता
कभी खुद पर कभी जिंदगी पर
पर एक कविता की चंद पंक्तियां
जब तुमने पूछा कि
किसके लिए लिखी क्यों लिखी?
तो क्या जवाब दूं?
कि क्यों लिखी किसके लिए लिखी?
एक कवयित्री हूँ मैं ,
क्या तुम नहीं जानते?
जैसे एक स्त्री अपने घर के
एक एक कोने को बड़े सलीके
से सहेजती है संवारती है।
वो खुद भी नहीं जानती कि
वो ऐसा क्यों करती है ?
ठीक उसी प्रकार
जीवन में घटित होने वाली
हर घटना ,सुख दुख के क्षण
विश्वास, जीत, हार, गुस्सा ,खुशी
छुअन, चुभन, टिस, प्रेम ,घृणा
उन सब भावनाओं को
एक कवयित्री अपनी लेखनी से
सजाती है संवारती है
जीवन के हर कोने को
लिखना ही आता है उसे
सलीके से सजाती है
उन भावनाओं को
जो दबी रह जाती है
अवचेतन मन की गर्तों में
फिर जरूरी नहीं कि
उन भावनाओं का स्रोत
केवल एक व्यक्ति पर ही केंद्रित हो
वो तुम हो सकते हो
तुम्हारा परिवार हो सकता है
मेरा परिवार हो सकता है
या काम का क्षेत्र हो सकता है
या समाज,या प्रकृति
या वो सपने हो सकते है
जो कभी पूरे न हुए हो
फिर कैसे बताऊं तुम्हें?
ये पंक्तियां क्यों लिखी?
मन की उड़ान कब
किस आसमान को छूने वाली है
किस नदी को सीमाओं को
तोड़ने वाली है
सागर की किस गहराई से
किस मोती को चुनने वाली है
उससे कैसी कविता होगी
ये तो मन ही जानता है।
फिर कैसे बताऊं कब क्यों लिखी?
कविता।