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जौहर की याद दिलाता हूं

Kavi abadh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            क्यों? अब तक में जीवित,जर्जर होकर संरक्षित हूं।
        
                                                    
                            
राजसी ठाठ का अहं लिए,तेरी हठ से संचित हूं।।

मुझे एक कुंडली मारे पगडंडी दिखती,
झाड़ झंकाड़ों में उकड़ूँ सा कुंठित हूं।
मेरी गौरव गाथा का होता महिमा मंडन,
पर अपने में कितना रहता मैं वंचित हूं।

हरदम खुशियों में उल्लास भरा,
अट्टहास कर पीता रहता हूं।
पहले भाट कवि नतमस्तक होते,
अब कवि से ताने सुनता रहता हूं।

विजयी पताकाएं फहरा थी गुम्बद पर,
गगन भेदी नारों में गूंजा हूं।
अनगिनत शूरवीर की लाशों में,
आंसू के दरियाओं का क्रंदन देखा हूं।

कोने कोने में घोड़े की टापों में,
दुख-सुख की डोली उठती थी।
खड़ग भाल की चमक लिए राजमहल की दीवार
लहू से रंगती थी।

अब शाम सुबह आती पास मेरे,
एक अपाहिज सा खुद में हूं।
पद्मावती के संग जौहर हो जाता,
ऐतिहासिक शान का उद्योतक में भी हूं।

अब जीर्ण शीर्ण हो संरक्षित हूं,
मैं उस जौहर याद दिलाता रहता हूं।
ये राज परम्परा है मेरी,
मैं सदियों को विश्वास दिलाता रहता हूं।
-अवध बिहारी मिश्र
एक वर्ष पहले
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