दीजै ऐसी पीर पिरम की हियरा नेह प्रदीप बने
दूर रहौ चाहे जतने पिय आतम के अति समीप बने
विरह अगिन में जर जर देही कुंदन ज्यों दमकन लागै
नैनन जल में बिंब तिहारो मिलन सुधा छलकन लागै
जदपि सुहावन भोर मिलन की साँझ भई तो प्रान दहे
अधरन की मुसुकान गई छिन अंसुअन के रस धार बहे
मैं चातक घन स्याम भये तुम स्वाति बूँद को तरस रही
बिन बादर ही इन अँखियन ते सघन बदरिया बरस रही
सूने रैन अँधेरन में पिय तोरी याद विभा सी लागै
विरह अगिन में जर जर देही कुंदन ज्यों दमकन लागै
अंसुअन सों पखराऊँ मारग जहँ जहँ तोरे चरन परें
साँस साँस को धूप बनाऊँ पीर पिरम की जहँ बिचरें
तन की माटी चंदन कर दूँ जो पिय तोरे भाल सजे
धड़कन को मैं ताल बनाऊँ तोरी ही धुन माहिं बजे
बिन पायल ही अब चरनन में नेह रुँनझुँन बाजन लागै
विरह अगिन में जर जर देही कुंदन ज्यों दमकन लागै
कंचन काया धूरि होइ पै मन को मुकुर मलिन ना होय
छूटि जाय जग की मरजादा तोरी छबि मन ते ना खोय
राग रंज विभूति में गाऊँ तोरे ही गुन आठों जाम
कवि भानु नहिं चाहत कछु अब बस हियरे बसियो मेरे स्याम
भानु उदय हो प्रीति गगन में रतियाँ भोर विहान सी लागै
विरह अगिन में जर जर देही कुंदन ज्यों दमकन लागै
-भानु शर्मा रंज