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मेरी ही वफ़ाएँ पुकारेंगी तुमको

Anonymous User

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            गगन में जो पूरब की लाली खिलेगी
        
                                                    
                            
मेरी ही वफ़ाएँ पुकारेंगी तुमको
कभी नींद में तुम अगर मुस्कुराए
मेरी ही खताएँ पुकारेंगी तुमको
भले भूल जाओ तुम सारे वो वादे
मेरी ही कसमें सताएंगी तुमको
गगन में जो पूरब की लाली खिलेगी
मेरी ही वफ़ाएँ पुकारेंगी तुमको

नदी बन के जब भी समंदर से मिलो
मेरे खारेपन का तुम्हें बोध होगा
छिपाओगे आँसू जो बरसात में तुम
तुम्हारे ही अंदर नया शोध होगा
छुपाओगे महफ़िल में जो अश्क अपने
मेरी ही उदासी रुलायेंगी तुमको
गगन में जो पूरब की लाली खिलेगी
मेरी ही वफ़ाएँ पुकारेंगी तुमको

तुम्हारे ही माथे का चन्दन हूँ मैं तो
मिटाकर भी खुशबू कहाँ खो सकोगे
हृदय में जो बोया है नेहों का अंकुर
उसे अश्क से तुम कहाँ धो सकोगे
तराशोगे पत्थर से जब कोई मूरत
मेरी ही निग़ाहें निहारेंगी तुमको
गगन में जो पूरब की लाली खिलेगी
मेरी ही वफ़ाएँ पुकारेंगी तुमको

तुम्हारे ही रस्ते की मैं धूल बन कर
तुम्हारे ही कदमों से लिपटा रहूँगा
अमावस की रातों में बनके मैं दीपक
तुम्हारे उजालों से सिमटा रहूँगा
जहाँ रंज की ये विभूति जगेगी
मेरी युग-चेतना ही मनाएगी तुमको
गगन में जो पूरब की लाली खिलेगी
मेरी ही वफ़ाएँ पुकारेंगी तुमको
-भानु शर्मा रंज
 
3 महीने पहले
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