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मेंहदी

Anonymous User

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हरी हरी इन पातिन में छुपि बैठ्यो है अनुराग सखी
        
                                                    
                            
सिल बट्टे पै पिसि पिसि कैं मैं जागी बनत सुहाग सखी

अपनो रँग रूप मिटाय दियो तब पीतम के कर राची हूँ
मैं मौन तपस्या सी तप कैं इस नेह नगर में नाची हूँ
बिरहा की तपन बुझावन कूँ मैं ओढ़ि चुकी बैराग सखी
हरी हरी इन पातिन में छुपि बैठ्यो है अनुराग सखी

सिल बट्टे पै पिसि पिसि कैं मैं जागी बनत सुहाग सखी
हथलेवा की इन रेखान पै मैं कुमकुम सो रँग घोर रही
जा जनम जनम के बंधन कूँ मैं प्रानन सों नित जोड़ रही
बिन बोले ही कह दीन्हीं है मेरे हियरे की आग सखी
हरी हरी इन पातिन में छुपि बैठ्यो है अनुराग सखी
सिल बट्टे पै पिसि पिसि कैं मैं जागी बनत सुहाग सखी

घिसि घिसि कैं नीर सनेहन में पिय की साँसन महकानी हूँ
मिटि कैं आपन पहिचान तिया मैं प्रेम कथा कहलानी हूँ
मोरे अँग अँग सों छलक रह्यो यह निश्छल नेह को त्याग सखी
हरी हरी इन पातिन में छुपि बैठ्यो है अनुराग सखी
सिल बट्टे पै पिसि पिसि कैं मैं जागी बनत सुहाग सखी

जो छूटि गई ई हाथन तें तो नैनन बिच बसि जाऊँगी
मैं रँग हिना को बनि करके पिय की धड़कन महकाऊँगी
मेरे रोम रोम में गूँजि उठ्यो एक अनहद मीठो राग सखी
हरी हरी इन पातिन में छुपि बैठ्यो है अनुराग सखी
सिल बट्टे पै पिसि पिसि कैं मैं जागी बनत सुहाग सखी

यौवन सूख्यो वा डाली पै पर मन में सावन छायो है
अस्तित्व विसर्जित करि अपना मैनें साँचो पीव रिझायो है
रंज भई अब दरस मगन जग गए जनम के भाग सखी
हरी हरी इन पातिन में छुपि बैठ्यो है अनुराग सखी
सिल बट्टे पै पिसि पिसि कैं मैं जागी बनत सुहाग सखी
-भानु शर्मा रंज
 
2 महीने पहले
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