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मैं शृंगार पे जीवन वारूँ या विरह से प्यार करूँ

Anonymous User

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            नयनों में सावन की नदियाँ साँसों में मरुथल की प्यास
        
                                                    
                            
मिलन अधूरी एक कविता है विरह मुकम्मल सा अहसास
पूछ रहा है मन बंजारा किस ऋतु का सत्कार करूँ
मैं शृंगार पे जीवन वारूँ या विरह से प्यार करूँ
मैं शृंगार पे जीवन वारूँ या विरह से प्यार करूँ

जब तुम थे तो भोर गुलाबी रातों में थी चंदन गंध
कली कली में रस बहता था खुलते थे प्राणों के बंध
बादल से जब बूँद झरी तो सूखी माटी महक उठी
तेरी पायल की रुनझुन पर मेरी धड़कन चहक उठी
स्मृतियों के इन उजले पल का कैसे हाहाकार करूँ
पूछ रहा है मन बंजारा किस ऋतु का सत्कार करूँ
मैं शृंगार पे जीवन वारूँ या विरह से प्यार करूँ

तुम बिछड़े तो सूनेपन ने ऐसा अपना जाल बुना
भीड़ भरी इस दुनिया में भी मैंने सन्नाटा ही चुना
अब तो चाँद जलाता मुझको सूरज देता सर्द हवा
इस दीवाने पागलपन की नहीं बनी है कोई दवा
सूनेपन के इस सागर को कैसे अब मैं पार करूँ
पूछ रहा है मन बंजारा किस ऋतु का सत्कार करूँ
मैं शृंगार पे जीवन वारूँ या विरह से प्यार करूँ

तप भी देखा जप भी देखा देखा है वैराग्य कड़ा
किंतु प्रेम के इस मंदिर में विरह देवता सबसे बड़ा
बिना विरह के शृंगार का जग में कोई मोल नहीं
अश्रु न हों तो इस जीवन में नेह सुधा का झोल नहीं
इस द्वंद्व भरे अंतर्मन का बोलो क्या उपचार करूँ
पूछ रहा है मन बंजारा किस ऋतु का सत्कार करूँ

मैं शृंगार पे जीवन वारूँ या विरह से प्यार करूँ
मैं शृंगार पे जीवन वारूँ या विरह से प्यार करूँ
-भानु शर्मा रंज
 
3 महीने पहले
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