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कुंकुम की बौछार

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                            गीत -कुंकुम की बौछार
        
                                                    
                            

प्राची के प्रांगण में उतरी
कुंकुम की बौछार
ओस नहाए पत्तों ने अब
किया नया शृंगार

मौन तपस्या में बैठे थे
तरुवर ध्यान लगाए
पवन परी ने आ चुपके से
मन्त्र नये दोहराए
भ्रमरों की टोली ने छेड़ा
अद्भुत राग मल्हार
चेतनता के स्वर में बहती
प्राणों की जलधार

नीले नभ का अक्स नदी के
जल पर उतरा ऐसे
परम तत्व ने निज हाथों से
रंग उँडेले जैसे
लहर लहर पर लिख दी रवि ने
किरणों की मनुहार
पुलकित होकर तट की माटी
बाँट रही है प्यार

डाल डाल पर विहग मण्डली
लगी सुनाने गाथा
पुष्प परागों से सुवासित
महक उठा वन माथा
कण कण में है व्याप्त ईश का
अदभुत सा विस्तार
अन्तर्मन में गूँज उठी है
अनहद की झंकार

यह प्रभात केवल अम्बर की
नहीं एक रंगोली
काल चक्र ने पन्नों पर जो
नई इबारत खोली
भ्रम के बादल छँट गए सारे
खुला ज्ञान का द्वार
मिटा तिमिर तो जगमग है अब
चेतन का दरबार

भानु शर्मा रंज
कवि एवं गीतकार
धौलपुर राजस्थान
2 महीने पहले
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