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कर्म-तपस्या (भाग - 2)

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Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            गहरी मिट्टी में दबकर ही,
        
                                                    
                            
बीजों ने नवजीवन पाया।
अँधियारे से लड़कर ही तो,
सूरज ने जग को चमकाया।

बिना तिमिर का सीना चीरे,
रवि का भी उजियार कहाँ है?
तपे बिना इस कर्मभूमि में,
बोलो जय-जयकार कहाँ है?।।

जहर पिया मीरा ने हँसकर,
सारे जग के ताने खाए।
चढ़े धधकती अग्नि प्रह्लाद,
तब जाकर श्रीहरि मुस्काये।

बिना परीक्षा प्राणों की तो,
ईश्वर का भी प्यार कहाँ है?
तपे बिना इस कर्मभूमि में,
बोलो जय-जयकार कहाँ है?।।

एकलव्य ने हँसते-हँसते,
निज अंगूठा काट चढ़ाया।
श्रद्धा की वेदी पर उसने,
सर्वोच्च गुरु-भक्ति को पाया।

बिना लहू की इस आहुति के,
निष्ठा का अधिकार कहाँ है?
तपे बिना इस कर्मभूमि में,
बोलो जय-जयकार कहाँ है?।।


पर्वत का अभिमान तोड़कर,
नदियां अपना मार्ग बनातीं।
काँटों की छाती पर चलकर,
कलियाँ फूलों सी मुसकातीं।

जो तूफानों से ना टकराए,
उस नौका का पार कहाँ है?
तपे बिना इस कर्मभूमि में,
बोलो जय-जयकार कहाँ है?।।

धनुष उठाया जब श्री राम ने,
सागर ने तब राह दिखाई।
वरना तीन दिवस तक उसने,
अनुनय की ही भाषा पाई।

बिना उठाए शस्त्र हाथ में,
कायर का निस्तार कहाँ है?
तपे बिना इस कर्मभूमि में,
बोलो जय-जयकार कहाँ है?।।

अंतर्मन के कुरुक्षेत्र में,
तुझको ही गांडीव उठाना।
अपने भीतर के कौरव को,
तुझको ही तो मार गिराना।

पौरुष की हुंकार बिना तो,
तेरा बेड़ा पार कहाँ है?
तपे बिना इस कर्मभूमि में,
बोलो जय-जयकार कहाँ है?।।
-भानु शर्मा रंज
 
2 महीने पहले
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