कबहुँ बाँसुरी की मधुर धुन सुनौगे
हिये माहिं मीठी कसक सी उठैगी
जभी कुंज-गलिन में अकेले चलौगे
तुम्हें राधिका की झलक सी मिलैगी
बिसारौ भले तुम सनेहौ हमारौ
प अंतर की पीरा दुरावौगै कैसे
भले और गोपी रिझावैंगी तुमकूँ
प मेरे जिय की लगन पावौगै कैसे
कबहुँ मोर-पंखी कुँ माथै सजौगे
तो अंतर में मेरी अगन सी जगैगी
कबहुँ बाँसुरी
गए मथुरा कूँ हमें छोड़ि कान्हा
ये अँखियां तिहारी डगर जोवती हैं
भले रूठि जाए सगरौ जमानौ
प निस-दिन ये बिरहन ही रोवती हैं
जभी याद जमुना के तट की करौगे
तो नीरन में मीठी लहर सी उठैगी
कबहुँ बाँसुरी
इन्हें सांवरौ रंग दियौ है तुम्हीं ने
ये नैना तिहारे ही मारग निहारैं
ये घुंघराली अलकें जो मोरी सजी हैं
पवन सँग उड़ैं औ तुम्हीं कूँ पुकारैं
कबहुँ बंसी-बट की डगरिया चलौगे
तो पग-पग पै मेरी भनक सी परैगी
कबहुँ बाँसुरी
बंधे प्रीत धागे में जनमन के नाते
कटीली सी बातों सूं टूटैं न सैयां
ये रस की नदी तो बही जाय हिय में
भले लाख तुम छोड़ि दीन्हीं हैं बैंयाजभी रात-दिन मेरौ सुमरन करौगे
तो सपनन में मेरी मूरत सी दिखैगी
कबहुँ बाँसुरी
लौटि आवौ भंवर मेरे गोकुल में प्यारे
पुनः रास-मंडल में रासहिं रचाएं
भले रूठि जावे ये बिधि औ बिधाता
प हम-तुम नए प्रेम-मारग बनाएं
जभी प्रेम-पाटी पै अच्छर लिखौगे
तो पोरन में मेरी छुअन सी जगैगी
कबहुँ बाँसुरी
-भानु शर्मा रंज