नील गगन की शांत गुफा में तुम एकाकी ध्यान प्रिये
तप्त मरुस्थल की छाती पर मैं दर्द का आख्यान प्रिये
आँसुओं की खारी स्याही से वक्त ने जो खत लिक्खा है
मैं उसी भीगे से कागज़ की आखिरी पहचान प्रिये
तुम किसी मंदिर की घंटी का एक मधुर निनाद सुनो
मैं किसी खंडहर में गूँजा शून्यता का नाद सुनो
तुम असीमित सूनेपन के भाल का सिंदूर अगर
मैं धरा की कोख से जन्मा एक नया अरमान प्रिये
नील गगन की शांत गुफा में तुम एकाकी ध्यान प्रिये
प्राण के इस सूने से मंच पर साथ जो तेरा है मिला
सूखे हुए से इस उपवन में पारिजात का फूल खिला
तुम समंदर के हृदय की अचल शांत मुस्कान अगर
मैं लहरों की छातियों पर मचला हुआ तूफ़ान प्रिये
नील गगन की शांत गुफा में तुम एकाकी ध्यान प्रिये
भेद अपना और पराया आज यहाँ सब मिटने लगे
साँसों के इस बहते जल में फासले सब घटने लगे
तुम अमर शिव की ही तरह वैराग्य का प्रतिमान अगर
मैं तुम्हारे पाँव पे रखा हँसता सा बलिदान प्रिये
नील गगन की शांत गुफा में तुम एकाकी ध्यान प्रिये
-भानु शर्मा रंज