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मैं पत्ता था, वो पेड़ थी।

Kaushal Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            पत्ता था, वो पेड़ थी।
        
                                                    
                            
यूँ तो हवा के झोंके बहुत आते थे,
पर हमारा साथ तोड़ नहीं पाते थे।
एक दिन हवा कुछ ऐसी चली,
मैं टूट कर ज़मीन पर आ गिरा।
आस-पास के लोग खुश तो बहुत हुए,
टूटा हुआ पत्ता देख कर।
मेरे मन में सवाल था कि
पेड़ ने क्यों किया साथ मेरे ऐसा?
अच्छा साथ था मेरा छूटा तो
साथ सबका छूटा था।
मैंने सोचा ये भी प्यार है
मैं कितना भोला था।
अच्छा मैं मुरझाऊंगा तो
तुम भी साथ मुरझाओगे न ?
पर कुछ ऐसा हुआ कि
हरा से रंग भूरा हुआ।
फिर ऊपर देखा तो मेरे जगह
एक नया पत्ता आया था।
फिर उसी हवा ने उनको वैसे ही
लहराया था...
फिर समझ आया...
कि ये पेड़ नहीं गंवाते जान अपनी पत्ते के जाने से
ये पत्ते सूख के जल भी जाते हैं पेड़ से बिछड़ने
2 सप्ताह पहले
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