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'यहीं आ जावें'

Kaushal kishor

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            करूँ भरोसा कैसे उन पर
        
                                                    
                            
देंगे मुझको शीतल छाँव?
दिन भर के इस श्रांत हृदय को
देंगे अपने आँचल ठाँव।
क्योंकि मुक्त होने से पहले
लगे थे करने तन-मन पीत।
लगे त्यागने थे वे पत्ते
अमल शस्यता से निज प्रीत।
स्यात् तृप्त हो चुका था तन–मन
एक विटप पर रहते-जीते।
या कि पिपासा पूर्ण हुई थी
एक घाट का पानी पीते।
लगता मन में अकुलाहट थी
पर दुनिया में मिल जाने की।
रचा रंगोली उस दुनिया में
नवल हरित रति को पाने की।
पर क्या ज्यों ही मुक्त हुए वो
हरी–भरी यह दुनिया त्याग।
मिली हरितिमा किञ्चित भी ना;
मिले पर्ण जो पकड़ें आग।
मुझे छोड़ जाने पर उनको
अगर रंच भी हृदय मलाल।
मैं हूँ यहीं, यहीं आ जावें
नव कोंपल बन अगले साल।
-कौशल किशोर मौर्य 'दक्ष' 
2 घंटे पहले
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