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ख़ुद की कशिश

Kashish Baranawal

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            पसंद है मुझे ख़ुद से बातें करना,
        
                                                    
                            
ज़िंदगी को अपनी शर्तों पर बुनना,
अपनी ही धुन में मलीन हो जाना,
और ख़ुद की कशिश में लीन हो जाना।

माना, परिपूर्ण नहीं हूँ मैं,
पर ख़ुद में नायाब ज़रूर हूँ
,भीड़ में भेड़ बनने की चाह नहीं,
मैं अपनी राह का ख़ुद ही दस्तूर हूँ।

मैं वो नहीं जो बयार के संग ढल जाऊँ,
मैं वो हूँ जो तप कर नया रंग लाऊँ,
औरों की पसंद में ख़ुद को क्यों ढूँढूँ,
क्यों न मैं ख़ुद अपनी पहचान बन जाऊँ?

लोग ढूँढते हैं कशिश किसी और में,
मैंने उसे अपने भीतर ही पाया है,
जिसे दुनिया महज़ मेरा नाम समझती है,
उसी कशिश ने मेरी उड़ानों को नया आकाश दिखाया है।
2 महीने पहले
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