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प्रेम के उपक्रम

Kartikeya Shukla

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मैं मरा,
        
                                                    
                            
किंतु तब - तब नहीं जब मैं प्रेम में था।

प्रेम में पड़े लोग मरते नहीं
मार भले दिए जाते हों।

एक पेड़ धरती के प्रेम में जब तक होता है
उस पर फल आते हैं
उसके साये में मुसाफ़िर पनाह पाते हैं
उसके डालियों पर पंछी घोंसला बनाते हैं।

एक नदी जब तक अपने किनारे रहने वाले लोगों के सहारे बहती है
उसके पास संस्कृति विकसित होती है
तीर्थयात्री उसमें नहाने आते हैं
उसमें मछलियाँ तैरती हैं।

एक नेता जब तक जनता को अपना मानता है
लोग उसे देवता के रूप में पूजते हैं
उसकी मूरत बनाते हैं
उसके साथ क़दम से क़दम मिला कर चलते हैं।

ये सारा उपक्रम प्रेम में होता है
प्रेम न रहे तो जीवन जीवन नहीं
मरण मरण नहीं।

जो भी अस्तित्वगत है
वह प्रेम की वज़ह से है।
2 महीने पहले
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