जब भी मां कहती मुझसे , दुनियादारी की समझ नहीं तुझे तुम भी अब समझदार बनो,
तब - तब उसको समझाती मैं तुम न इतना अब डरों।
माना की नादान मैं थोड़ी , थोड़ी जग से अनजानी हूं,
मगर ऐसा भी नहीं कि स्वाभिमान से मैं हारी हूं।
क्यों मैं त्यागूं लड़कपन अपनी , क्यों इतनी समझदार बनूं?
दुनिया चलती भीड़ चाल तो क्या मैं भी उनके साथ चलूं?
जिंदगी गुज़र रही सुकुन से यही रवानी अच्छी लगती हैं ,
मुझे तो मेरी नासमझी , नादानी , मेरे अंदर की वो मासुम सी बच्ची अच्छी लगती हैं।।
द्वेष , नफरत ,लालच और दिखावे की राह मुझे न चलना है ,
हर उम्र में मुझको बचपन सा सच्चा बनकर रहना है।।