शेष... बेहद विशेष
सिरहाना थोड़ा ऊँचा क्या कर लिया,
अब आसमां कुछ नज़दीक लगने लगा है...
वही शाम, जो कभी रोज़ का एक दस्तूर थी,
अब ठहरकर माथे को चूमती है।
धूप की तल्ख़ी अब चुभती नहीं,
सर्दियों की गुनगुनी धूप सी सुहाती है।
वक़्त की जेब में अब सिक्के कम हैं शायद,
पर हर एक सिक्का अब कीमती लगने लगा है।
ये जो शेष बची है ज़िंदगी,
अब न जाने क्यों... बड़ी विशेष लगने लगी है!
चाय की प्याली से उठते धुएँ में,
अब कोई चेहरा नहीं, बस सुकून दिखाई देता है।
कमरे के कोने में पड़ी उस पुरानी डायरी को,
अब धूल नहीं, एक गहरा ताल्लुक़ ढँकता है।
भागने की जल्दी में जो मोड़ छूट गए थे,
उन मोड़ों पर रुककर हवा का रुख़ देखना...
किसी पुराने गीत के अंतरे को गुनगुनाना,
और खुद ही खुद पर हौसले से मुस्कुराना।
कोई गिला नहीं कि क्या खोया, क्या पाया,
किताब का आख़िरी सफ़ा अब हसीन लगने लगा है।
हाथों की लकीरें भले धुंधली हो गईं,
पर दिल का रास्ता साफ़ दिखने लगा है।
हाँ, ये जो शेष बची है ज़िंदगी,
अब हर लम्हा... बेहद विशेष लगने लगी है!
-कपिल देव जुल्का