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जीवन का स्कार्फ़ (पद्य)

Kapil Dev Julka

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जब हिम-सी बर्फीली रजनी की गोदी में,
        
                                                    
                            
शीतल चंदा अपनी उज्ज्वल रश्मि गिराता है;
तब ऐसा लगता है मानो इस जड़ जग में,
कोई जीवन की पावन, उर-ऊष्मा पाता है।

यह जीवन क्या है? रोज़मर्रा की साँसों का,
सपनों के ताने-बाने से बुना हुआ इक स्कार्फ़ है;
कुछ दिन इसके नीरस और साधारण होते हैं,
पर कुछ पलों में छिपा अचरज का कोई ख़्वाब है।

उस धधकते हुए पावन सपने को तुम,
अपने अंतर्मन की गहराई में थामे रखना;
चाहे जितनी भी आए बाधा जीवन में,
संकल्प की इस उर्वर भूमि पर डटे रहना।

जैसे मुट्ठी से महीन रेत फिसल जाती है,
वक्त की गति भी वैसे ही बढ़ती जाएगी;
तुम समय के हर एक अमूल्य कतरे को,
हथेली में भींचना, वह फिर न लौट आएगी।

ऋतुएँ बदलेंगी, यहाँ लोग भी बदलेंगे,
राहों के सुंदर नज़ारे भी बदल जाएँगे;
पर सत्य, निष्ठा और अपने वादों के दीप,
झंझावातों में भी कभी न बुझने पाएँगे।

कदमों को मत रोकना, राहें बुलाती हैं,
आगे का पथ धीरे से तुमको पुकारता है;
बस समेटो अपनी हिम्मत और मौन रहकर,
बढ़ते चलो, क्योंकि चलना ही जीवन का सार है!
-कपिल देव जुल्का
3 घंटे पहले
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