किस सिम्त को कदम बढ़ाऊँ, समझ नहीं आता,
करियर चुनूँ, पैसा या रिश्ते, समझ नहीं आता।
दौड़ता हूँ जब तरक्की के पीछे, वो ऊँचे मकान देखने,
तो पीछे छूटा वो छोटा सा घर, बहुत याद आता है।
मखमली गद्दों पर भी नींद कहाँ आती है सुकून की,
जब अपनों का वो पुराना सा आँचल, बहुत याद आता है।
पैसा कमाने की इस अंधी, बेबाक जंग में,
मैंने हर एक जज़्बात को, बाज़ार में बिकते देखा है।
तिजोरियाँ तो भर गईं मेरी, चमचमाते सिक्कों से,
पर इन खाली हाथों में, रिश्तों को सिसकते देखा है।
तन्हाइयों का ये दर्द, अब सहा नहीं जाता,
किस सिम्त को कदम बढ़ाऊँ, समझ नहीं आता।
सोचता हूँ, सब छोड़-छाड़ कर लौट जाऊँ उसी गली में,
जहाँ सिर्फ़ मोहब्बत थी, और कोई हिसाब नहीं था।
पर इस बेरहम ज़माने की ज़रूरतों को कैसे भूलूँ,
जहाँ भूखे पेट रहने का, कोई ख़्वाब नहीं था।
कामयाबी की चमक में, एक धुंधली सी तन्हाई है,
और रिश्तों की छाँव में, एक मखमली सी रुसवाई है।
जीने की इस जद्दोजहद में, सांसें भी अब भारी हैं,
ऐ दिल! बता तू ही, अब किसकी यहाँ बारी है?
काग़ज़ के इन नोटों से, मैं दिल की दरारें कैसे भरूँ?
और बिना पैसों के, इस मतलबी दुनिया से कैसे लड़ूँ?
हर रास्ता एक नया दर्द, एक नया मोड़ दिखाता है,
किस सिम्त को कदम बढ़ाऊँ, समझ नहीं आता...
करियर चुनूँ, पैसा या रिश्ते, समझ नहीं आता।
-कपिल देव जुल्का