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बांध काविश के वो सहरे 'तिलिस्माई प्रकाश'

kamlesh ranjan

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                            *बांध काविश के वो सहरे* *'तिलिस्माई प्रकाश'*
        
                                                    
                            

टिमटिमाते आकाश को आज चल हमसफ़र बनाकर
ना मिटने वाले ख्वाबों को आँखों में सजाकर
कोई उम्मीद तो जगा ले इस कदर ए-मेहरबां
मिटी हुई लौ को फिर दिलों में जलाकर
पा लेना वो तिलिस्माई प्रकाश , अंदाज-ए अपना यूँ बयॉंकर !

हाँ बुझी हुई हौंसले को फिर दिलों में जगाकर
पा ही लेना वो तिलिस्माई प्रकाश, अंदाज-ए अपना तु यूँ बयॉंकर !

फट पड़ेगे जब अवसाद के शोले वो गहरे
तब पतझड़ के मौसमों में मुस्कुराएगें चेहरे
उस दिन आइने में तु भी घमंड कर रौब दिखा
क्यूंकि ख़बर हैं परेशानियों का दौर उसपे सौ पहरे
दलेराना छु लेना तिलिस्माई प्रकाश को, बांध काविश के वो सहरे !

ख़बर हैं परेशानियों का दौर और आदमी पर सौ पहरे
दलेराना छु ही लेना तिलिस्माई प्रकाश को, बांध काविश के वो सहरे
बांध काविश के वो सहरे !
एक महीने पहले
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