जब चढ़ा लिया तीर कमान पे,
तो क्यों देखता है आसमाँ का कद?
दिशा तय कर और लक्ष्य भेद,
नाश-विनाश तो देखा जाएगा।
जब लिखा है ख़ुद ही रास्ता,
तो ये कदम ही तय करेंगे।
कितने काँटे, कितने पत्थर—
जो भी मिलेगा, देखा जाएगा।
तोड़ दे उन नियमों को,
कहाँ लिखा है तू घायल?
निकल जा उस पिंजरे से,
उड़ना कहाँ—देखा जाएगा।
जब तक चलती साँस तन में,
तू चलता जा, तू करता जा।
छोड़ दे अब घर की राहें,
कहाँ चलना—देखा जाएगा।
थककर न बैठ, ऐ मुसाफ़िर,
मंज़िल देख रही राह तेरी।
डरता क्यों इन अँधेरों से,
जब होगा सवेरा—देखा जाएगा।
— कमल सिंह डिण्डोर