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आज़ादी का जश्न

kamal jha

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आज फिर आज़ादी का जश्न है,
        
                                                    
                            
पर मन में अधूरे कुछ प्रश्न हैं।
आज़ादी का क्या है अर्थ?
क्या सिर्फ यह उत्सव पर्व?

क्या आज़ादी बस इतनी है,
हम सिर्फ इसकी बात करें?
या फिर आँसू को भी पोंछें,
जो बेबस की आँखों से बहें।

क्या आज़ादी सिर्फ अधिकार है,
हमें कर्तव्यों का भी एहसास हो?
जाति, धर्म और भाषा से ऊपर,
कोई भेद नहीं, हर इंसान खास हो?

सच में आज़ादी तब पूरी होगी,
जब भूखा कोई सोएगा नहीं?
जब नारी निर्भय होकर चलेगी,
और कोई सपना रोएगा नहीं।

जब रिश्वत से न झुकें उसूल,
सच बिकने को तैयार न हो।
मेहनत को उसका हक़ मिले,
न्याय किसी का उधार न हो।

आओ आज यह प्रण करें,
देश को बेहतर कल देंगे।
सिर्फ़ तिरंगा लहराएँगे नहीं,
उसकी शान भी सदा रखेंगे।

आज फिर आज़ादी का जश्न है,
अब उत्तर भी हमारे पास हो।
ऐसा भारत सब मिलकर गढ़ें,
जिस पर हम सबको गर्व हो।
—कमल किशोर झा 
3 महीने पहले
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