मैं उठी हुई आफ़तों का सैलाब हूँ
समंदर के राज़ का वो गहरा साज़ हूँ
न कोई हरा पाया है मुझको कभी,
मैं हर टूटे किनारे का मुकम्मल बाँध हूँ।
थी खता लहरों की और साहिल रो पड़ा,
किनारों ने जिसे बदनाम किया, मैं वो राज़ हूँ।
ज़माने की बंदिशें तोड़ दूँ एक पल में,
मैं किनारों से उठा वो खौफ़नाक तूफ़ान हूँ।
मुझे दबाने की कोशिश न कर ऐ दुनिया,
मैं बुझती हुई नहीं, दहकती हुई आग हूँ।
अंधडे भी अदब से गुज़रती हैं मुझसे,
मैं अपनी ही धुन में बजता साज़ हूं
-कालू राम सैनी