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दोस्ती का सिलसिला

kalu ram

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            तेरी-मेरी दोस्ती का सिलसिला अब ठहर गया,
        
                                                    
                            
क्यों विधाता की नज़र में प्यार का दिन ढल गया।
थी बहुत मासूम यारी, दूरियों की मार है,
जो हँसी अपनी ज़मीं थी, अब वहाँ दीवार है।
वो बेफिक्र बचपन हमारा, शाम का वो शोर भी,
खींचती थी पास जो, वो अनजानी सी डोर भी।
खो गईं बातें हमारी, खो गई दुनिया वो सारी,
सो गई मासूमियत और सो गई खुशियाँ हमारी।
माना सन्नाटों ने मिलकर आज हमको घेरा है,
यादों के पुराने साज़ पर अब गर्द का डेरा है।
इन तकरार के काँटों ने चाहे राह को रोका मगर,
दिल ये कहता है कि ये तो वक़्त का धोखा मगर।
ज़िंदगी बिछड़ी हुई है, सांस भी मजबूर है,
क्यों हमारी ये अधूरी दोस्ती गुमसुम सी दूर है।
अब तो मिलने को तरसते, वक़्त का भी अकाल है,
वक़्त को मिलने से डर है, ऐसा अपना हाल है।
हम कहाँ बदले थे यारा, बस ये हालात बदल गए,
ख़्वाब के पीछे जो भागे, दिल के जज़बात बदल गए।
पर पलट कर आज भी जब गुज़रे कल को देखता,
अपनी ही परछाई में मैं यार तुझको ढूँढता।
राह में सहमी खड़ी हैं, आज भी वो यादें पुरानी,
कब उम्मीदों का उगेगा चाँद, बदलेगी कहानी।
फिर वही ढलती सुनहरी चाँदनी आ जाएगी,
रातों की उन गुफ़्तगू में ताज़गी छा जाएगी।
रूठ सकता है न रब, ये वक़्त का बस फेरा है,
काली इस रात के पीछे ही छुपा सवेरा है।सच्ची दोस्ती का वो चाँद फिर से मुस्कुराएगा,
तेज़ अपनी दोस्ती को दे के वो चमकाएगा।
18 घंटे पहले
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