अपनी ही तलाश में...
अपनी ही तलाश में निकला था मैं अपनों की तलाश में,
अपनों की तलाश में निकला था, तो पाया खुद को अपनी ही आस में।
एक ऐसा धागा हूँ मैं, जो बुनता भी खुद को है और उलझता भी खुद में है,
पराया कोई नहीं, और अपना भी कोई कहाँ इस कश्मीकश में है।
ढूँढ रहा था सदियों से, उस मन के भीतर के उस राज में,
छिपा बैठा था जो मौन बनकर, इस ज़माने के गहरे साज़ में।
क्या मैं वो हूँ जो दिखता हूँ, या वो जो छुपा हूँ परतों में?सवाल बनकर तैर रहा हूँ, मैं खुद ही अपनी शर्तों में।
कुछ बंधन, कुछ रिश्ते और कुछ इंसानी फितरतों में,
मैंने ढूँढा है वजूद अपना, लोगों की बदलती आदतों में।कभी लगा कि रिश्ता ही हकीकत है, बंधन ही किनारा है,
पर कभी लगा कि इस भीड़ में, हर शख़्स तन्हा और बेचारा है।
कुछ इस कदर ढूँढा था मैंने, मन के भीतर के उस राज में,
कि खो गई पहचान मेरी, इस बहरे और गूँगे समाज में।
अब न कोई शिकायत है खुद से, न अपनों से कोई गिला है,
इस अंतहीन तलाश के सफ़र में, मुझे आख़िरकार मैं ही मिला हूँ।
मैं ही मुसाफ़िर हूँ, मैं ही रास्ता, और मैं ही मंज़िल का नज़ारा है,
अपनों को समेटते-समेटते, मैं खुद में बिखरा एक सितारा हूँ।
यह खोज कभी ख़त्म न होगी, यह सिलसिला यूँ ही चलना है,
खुद को खोकर अपनों में, और अपनों को पाकर खुद में ढलना है।
-कालू राम सैनी