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जब समय रो पड़ा

Kajol Uikey

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            एक दिन समय ठिठक गया,
        
                                                    
                            
घड़ी की धड़कन थम सी गई।
सदियों से जो चुप चलता था,
उसकी आंखें नम सी गई।

मैंने पूछा -
"हे समय ! तुम क्यों रोते हो ?
तुम तो सबको राह दिखाते,
फिर आंसू क्यों ढोते हो?"

समय बोला -
मैं इसलिए नहीं रोता,
कि लोग मुझे भूल गए।
मैं इसलिए रोता हूं ,
कि लोग इंसान होना भूल गए।

रिश्ते अब स्क्रीन में कैद हैं,
आंगन सूने पड़े हुए।
अपने होकर भी अपने नहीं,
मन कितने बंटे हुए।

मां की आंखें राह निहारे,
बेटा व्यस्त बाजारों में।
पिता की झुर्रियां बोल रही हैं,
कोई सुनता नहीं पुकारों में।

बचपन मिट्टी छोड़ चुका है,
मोबाइल का संसार मिला।
हंसी खिलौनों में खो बैठी,
हर चेहरा लाचार मिला।

धरती की हरियाली रोई,
कटते देखा जब जंगल को।
नदियों ने भी दर्द सुनाया,
सूखते देखा अपने जल को।

सच बिकता है थोड़े दामों में,
झूठों का दरबार बड़ा।
ईमान अक्सर हार गया,
स्वार्थ का व्यापार बड़ा।

मैंने युग बदलते देखे हैं,
राजा ,रंक,फकीर सभी।
पर प्रेम से बढ़कर धन को चाहा,
ऐसी दौड़ न देखी कभी।

फिर मैंने समय से कहा ,
क्या फिर उजियारा आएगा ?
वह मुस्काकर धीरे से बोला,
"हां, यदि मनुष्य मनुष्य बन पाएगा।"

जब फिर से मां का सम्मान होगा,
पिता का माथा ऊंचा होगा।
जब मेहनत पूजा कहलाएगी,
तब हर घर में सवेरा होगा।

जब कोई भूखा सोएगा नहीं,
जब आंसू यूं बहेंगे नहीं।
जब नफरत हार जाएगी,
तब मेरे भी नयन भरेंगे नहीं।

इतना कहकर समय चला,
फिर अपनी राह पकड़ ली।
लेकिन जाते-जाते उसने,
मेरे मन पर एक बात लिख दी ।

घड़ी की सुइयां केवल समय नहीं बतातीं,
वे जीवन का मूल्य भी सिखाती हैं।
जो हर पल को प्रेम, सत्य और कर्म से भर देता है,
उसके लिए समय कभी नहीं रोता
समय उसके साथ मुस्कुराता है।
-काजोल उइके
 
3 महीने पहले
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