राधा-कृष्ण
प्रेम यदि केवल पाने का नाम होता,
तो वह समय के साथ बदल जाता।
किन्तु
राधा और कृष्ण ने
प्रेम को मिलन से नहीं,
समर्पण से अमर किया।
राधा ने
कृष्ण को कभी बाँधना नहीं चाहा,
और कृष्ण ने
राधा को कभी भुलाया नहीं।
एक वृन्दावन में रहीं,
दूसरे द्वारका चले गए,
परन्तु दूरी
उनके प्रेम की सीमा नहीं बन सकी।
क्योंकि
जहाँ स्मरण साँस बन जाए,
वहाँ बिछड़ना भी
आराधना बन जाता है।
राधा का नाम
कृष्ण से पहले लिया जाता है,
क्योंकि प्रेम में
अधिकार नहीं,
आत्मसमर्पण का सौन्दर्य होता है।
कृष्ण की बाँसुरी का प्रत्येक स्वर
आज भी यही कहता है—
"जो प्रेम आत्मा तक पहुँच जाए,
उसे साथ रहने की आवश्यकता नहीं होती;
वह तो हर धड़कन में,
हर प्रार्थना में,
हर मौन में
सदैव उपस्थित रहता है।"
शायद इसी का नाम है—
राधा-कृष्ण।
जहाँ प्रेम
शब्द नहीं,
शान्ति बनकर हृदय में उतरता है।
- काजल नायक