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ख्वाहिशें

Jyotsna Ojha

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            खिलते कचनार सी ख़्वाहिशें,
        
                                                    
                            
दिन-रात खिला करतीं हैं ,शाख पर
बिखर जाती हैं फिर, जमीं पर,
अपने ही पाँव तले आने,
ताजे खिले फूल सी,
कुछ जिंदा रहती हैं, जमीं पर,
मुनासिब वक्त के इंतज़ार में,
राह चलते राहगीर की निगाह में आने ।
3 वर्ष पहले
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