खिलते कचनार सी ख़्वाहिशें,
दिन-रात खिला करतीं हैं ,शाख पर
बिखर जाती हैं फिर, जमीं पर,
अपने ही पाँव तले आने,
ताजे खिले फूल सी,
कुछ जिंदा रहती हैं, जमीं पर,
मुनासिब वक्त के इंतज़ार में,
राह चलते राहगीर की निगाह में आने ।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X