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ख्वाहिशें

                
                                                         
                            खिलते कचनार सी ख़्वाहिशें,
                                                                 
                            
दिन-रात खिला करतीं हैं ,शाख पर
बिखर जाती हैं फिर, जमीं पर,
अपने ही पाँव तले आने,
ताजे खिले फूल सी,
कुछ जिंदा रहती हैं, जमीं पर,
मुनासिब वक्त के इंतज़ार में,
राह चलते राहगीर की निगाह में आने ।
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3 वर्ष पहले

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😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
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