विज्ञापन

मेरे हिस्से के तुम

Anonymous User

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            प्यार मुझे भी था और शायद तुम्हें भी,
        
                                                    
                            
मैं मगरुर थी तुम मजबूर थे ।।

काश ये समझ पाते तुम कि जब
तुम्हारे तन का,  मन का, जीवन का टुकड़ा
उन तस्वीरों में कैद दिखा।
मुझे चिढ़ाता, हंस रहा था वो मुझे रोता देख के
सबकुछ न्योछावर करके भी ठगता देख के

कितना कुछ खो गया मेरा
बंट गया सब कुछ हिस्सों में
लेकिन मेरे हिस्से सिर्फ एक टुकड़ा आया
तुम्हारे धोखे का।
मैं तुम्हारे बस इस हिस्से को पा के भी माफ़ कर देती।।

लेकिन उस गलती की क्या बात करूं
जिसकी तुमने माफी भी न मांगी
मेरी मासूमियत, उस विश्वास, उस प्यार के कत्ल की
तुम्हें तो पता भी नहीं की, मैंने खुद को खो दिया आज
क्या सजा दूं इसकी, तुम को ।
तुम्हें तो एहसास भी नहीं
मेरी इन आंसुओं का,
जो तुम्हें खोने के गम के साथ ही निकल रही हैं।
कैसे बताऊं तुमको मैं
कि कौन से आंसू तुम्हारे लिए हैं
और कौन से अपने लिए
कैसे दिखाऊं तुमको
कैसे समझाऊं तुमको
तुम्हारी ये कत्ल की दास्तां
तुमको ही कैसे सुनाऊं मैं।।

काश इन आंसुओं के भी अलग अलग रंग होते
तो शायद कुछ आंसू तुम्हारे भी अक्ष में होते।।


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
6 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Shivam Kumar

1 कविता

View Profile