बातों की ख़लिश थी या रातों की,
अब तक सुलझी नहीं गिरह उन मुलाक़ातों की।
कुछ शब्द अधरों की देहरी पर ही ठिठक गए,
कुछ अर्थ विलीन हुए मौन की गहन परतों में।
स्मृतियाँ नीरवता का व्रत साधे आज भी मौन हैं,
समय ने मानो उन्हें अनंत प्रतीक्षा का अभिशाप दिया है।
ऋतुएँ बदलती रहीं अपने शाश्वत क्रम में,
पर मन के आँगन में तुम्हारे विरह का पतझड़ ठहरा रहा।
फिर एक दिन जाना—
प्रतीक्षा किसी और की नहीं, स्वयं की थी।
जिसे तुम्हारा होना समझती रही,
वह तो मेरे ही अस्तित्व की अनसुनी प्रतिध्वनि थी।
तुम कहीं गए ही कब थे...
बिछुड़ा था केवल मेरा भ्रम,
तुम तो हर श्वास में उसी निःशब्द आलोक की तरह थे,
जिसे आँखें नहीं, अंतर्मन देखता है।
अब न मिलन की आकांक्षा है,
न विरह का संताप,
क्योंकि जहाँ 'मैं' समाप्त होता है,
वहीं तुम अपने संपूर्ण विस्तार में प्रकट हो...
प्रेम अंततः किसी तक पहुँचने की यात्रा नहीं,
स्वयं से स्वयं तक लौट आने का नाम है—
जहाँ 'तुम' भी मैं' हो,
और 'मैं' भी तुम'।
-ज्योति अग्निहोत्री "नित्या",