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चूडियों की वो खनखनाहट

Jaykishan Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            चूडियों की वो खनखनाहट
        
                                                    
                            
मुझे अक्सर याद आती है
याद है मुझे वो हर सुबह
जब वो कान में फुसफुसाती
और चूडियों की ध्वनि
एक नया संगीत बनाती
उस संगीत में
एक रस था मधुरता का
एक रस था उत्तेजना का
उसकी सॉसों में
एहसास था मीठेपन का
एहसास था बचपन का
उस संगीत की मासूमियत
अक्सर मुझे बुलाती है
चूडियों की वो खनखनाहट
मुझे अक्सर याद आती है
अब सुबह तो हर रोज होती है
पर चलने की उत्तेजना
हर रोज ढेर होती है
कभी गिनता हॅू दिन अपने
तो कभी बुनता हॅू
अतीत के वो सपने
बीते लम्हों की बुनियाद
रह रह कर मुस्कराती है
चूडियों की वो खनखनाहट
मुझे अक्सर याद आती है
एक महीने पहले
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