आख़िरी तीर मेरे तरकश में
एक तू ही आख़िरी तीर बचा है, मेरे तरकश में
तेरी वार की कोई सानी नहीं मैं जानता हूँ मगर दुश्मन भी कोई कम नहीं
एक झटके में तुझे छोड़ के पूरा खेल ख़त्म करना, ख़्वाहिश मेरी कोई कम नहीं।
तुझे छोड़ूं या रहने दूं मैं फंसा हूँ इसी कशमकश में
एक तू ही आख़िरी तीर बचा है, मेरे तरकश में।
जब मैं तुझे तरकश में ही रहने दूं तो फिर क्या मतलब तेरे और मेरे यहाँ रहने का
यहां बेमतलब कुछ भी नहीं फिर दुख क्या जीने और मरने का।
जीने के लिए जान की बाज़ी लगाते हैं सरकस में
एक तू ही आख़िरी तीर बचा है, मेरे तरकश में।
अब तुझे पास रखने का मेरा कोई इरादा नहीं
मेरा बचना तो तय है पर तुझे बचाने का कोई वादा नहीं।
ठहरा है जहन मेरा, अब कुछ भी नहीं मेरे बस में
एक तू ही आख़िरी तीर बचा है, मेरे तरकश में।
- जयंत
हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।