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आख़िरी तीर मेरे तरकश में

jayant patel

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आख़िरी तीर मेरे तरकश में
        
                                                    
                            

एक तू ही आख़िरी तीर बचा है, मेरे तरकश में

तेरी वार की कोई सानी नहीं मैं जानता हूँ मगर दुश्मन भी कोई कम नहीं
एक झटके में तुझे छोड़ के पूरा खेल ख़त्म करना, ख़्वाहिश मेरी कोई कम नहीं।

तुझे छोड़ूं या रहने दूं मैं फंसा हूँ इसी कशमकश में
एक तू ही आख़िरी तीर बचा है, मेरे तरकश में।

जब मैं तुझे तरकश में ही रहने दूं तो फिर क्या मतलब तेरे और मेरे यहाँ रहने का
यहां बेमतलब कुछ भी नहीं फिर दुख क्या जीने और मरने का।

जीने के लिए जान की बाज़ी लगाते हैं सरकस में
एक तू ही आख़िरी तीर बचा है, मेरे तरकश में।

अब तुझे पास रखने का मेरा कोई इरादा नहीं
मेरा बचना तो तय है पर तुझे बचाने का कोई वादा नहीं।

ठहरा है जहन मेरा, अब कुछ भी नहीं मेरे बस में
एक तू ही आख़िरी तीर बचा है, मेरे तरकश में।

 - जयंत

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