क़रीबी का मकान पता जा रहा है
किया जो अब नसीब अता जा रहा है
इधर दिल मचलता जा रहा है
किसी की याद पलता जा रहा है
चला भी वो गया मेरा सनम जो
कहीं से फिर धड़कता जा रहा है
उसे यूं देख कर मैं खो गया
वहीं फिर दिल संभलता जा रहा है
यहीं पर पास बैठा था अभी
धीरे से अब सरकता जा रहा है
बुझा इक दीप देखा था कहीं
दुबारा वो दहकता जा रहा है
बदल कर अब जहां भर में सबा
ख़ुदा खुद भी बदलता जा रहा है
कली से फ़ूल निकली थी यहां
सुबह से घर महकता जा रहा है
निशां अबतक सरहदों पे है पड़ा
दिलों में तू झगड़ता जा रहा है
जुबां जब बात से भी है बड़ा
नज़र फिर क्यों बहकता जा रहा है
सितारा है धुंआ से ही घिरा
सिरा चंदा चमकता जा रहा है
जरा सा इक सुकूं के लिए
परिंदा भी चहकता जा रहा है
उसे पूरा भिगाया है कहीं
अना मेरा बरसता जा रहा है
खड़ा है जो करीब 'जयंत' भी
अभी तक से सहमता जा रहा है
- जयंत
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