ये मेरे गाँव की गलियाँ,
कुछ खुली तो कुछ सँकरी गलियाँ,
आधी पक्की तो कुछ कच्ची गलियाँ।
कहीं पानी ठहरा, कहीं बहता पानी,
नाम मात्र की हैं इनकी नालियाँ,
कहीं गंदी तो कहीं साफ-सुथरी गलियाँ।
सुबह और शाम व्यस्त गलियाँ,
दिन में सूनी और उदास गलियाँ।
सुबह चार बजे से हो जाती चहल-पहल,
और महक जाती हैं ये गलियाँ।
गाय-भैंसों, ढोर-डंगरों को पानी पिलाने,
चारा डालने की जल्दी,
साइकिलों पर कपड़ा मारने,
दूध दुहकर शहर पहुँचाने की जल्दी।
किसानों को खेतों पर जाने की जल्दी,
बैलों को दाना-पानी खिलाने की जल्दी,
बैलों के गले में खन-खन बजती घंटी,
उनके पैरों की आहट सुनने की जल्दी।
औरतों के कूड़ा-कबाड़ बाहर फेंकने,
इधर-उधर आते-जाते बतियाने की जल्दी।
अब आया हम बच्चों का नंबर,
लोटा-डोरी उठाकर जंगल-पानी जाने की तैयारी,
कोई कुएँ पर नहाने जाता, कोई नहाकर आता,
फिर बस्ता उठाकर स्कूल को जाते।
नवंबर हो या दिसंबर,
स्कूल से आकर खेल में लग जाते,
गोधूलि उड़ाते,
गाय-भैंसें, किसान-मजदूर,
घर को लौट आते,
और शाम ढलते ही,
इन गलियों की चहल-पहल थम सी जाती है।