चश्मा रख कर दिया है कहीं,
पता नहीं कहाँ रख दिया।
कब से ढूँढ रहा हूँ,
बिस्तर देखा, टेबल देखी,
देख ली है अलमारी,
अखबार लेकर कब से ढूँढ रहा हूँ,
शायद अकल गई है मेरी मारी!
छोटे लड़के से पूछ लिया,
पोते से पूछ लिया,
अब पत्नी की रह गई है बारी।
पत्नी से पूछा तो वह झल्ला कर बोली,
"अब तुम रिटायर हो गए हो,
अपनी चीजें खुद संभाल कर रखा करो सारी,
जिम्मेदारी नहीं है हमारी!"
बाथरूम देखा, देख लिया सोफे के भी नीचे,
सारा घर ढूँढ लिया है,
देख लिए सारे बाग-बगीचे।
सारे दिन की खजल-खवारी होकर बैठ गया,
होकर पसीने-पसीना!
माथे का जब पोंछा पसीना,
याद आ गया,
माथे पर लगा है ये चश्मा!
पा कर चश्मा सकून आ गया दिल को,
फूल गया है ये सीना!
-जसवंत राय शास्त्री