गुनहगार के साथ लाखों खड़े हैं
सताए हुए लोग तन्हा पड़े हैं
उजालों की तारीफ़ होती नहीं है
मगर उन अँधेरों के चर्चे बड़े हैं
हक़ीक़त उन्हें फिर नज़र कैसे आए
जब आँखों पे लालच के परदे चढ़े हैं
ये फल हैं, मगर फल के जैसे न कतई
बड़े पिलपिले और भीतर सड़े हैं
यही हम दरख़्तों की पहचान, भाई
हवा के मुख़ालिफ़ भी तनकर खड़े हैं
डरे भी नहीं और न मैदान छोड़े
भले हम न जीते, मगर हम लड़े हैं
हमें फ़िक्र उनकी है खुद से ज़ियादा
इरादे हमारे जो हमसे बड़े हैं
-डी एम मिश्र