अगर तुम ना होती तो मैं बिखर गया होता
ग़म -ए- दरिया में डूब के मर गया होता
अपने प्यार से तुमने मेरा दामन भर दिया
वरना इस ग़म -ए- दौरा में मैं गुजर गया होता
तेरी वफ़ाओ ने ही निखारा है मुझे
जाने मैं कबका ख़ाक बसर हो गया होता
तुम आ गई तो नूर की चाह बड़ी फिर जी लेने की
तुम ना होती साएबा तो मैं उजालों से डर गया होता