"ज़िंदगी एक गीत है"
ज़िंदगी एक गीत है, गुनगुनाते रहो,
हर हाल में तुम, मुस्कुराते रहो।
कोई भी नहीं, यहाँ सम्पूर्ण होता,
गुण-अवगुण का ही, संगम होता।
इसलिए कुछ कमियाँ, नज़रअंदाज़ करो,
टूटे रिश्तों को फिर से, आज़ करो।
हर रिश्ता बंधा है, थोड़ी ढील से,
टूट जाता है वो, ज्यादा खींच से।
परिस्थिति आए तो, घबराना नहीं,
उसे अपना शिक्षक, बनाना वहीं।
वो दो शक्तियाँ, तुम्हें दे जाएगी,
जो किस्मत भी, दे न पाएगी।
एक तो सहने की, शक्ति अपार,
दूसरी सामना करने की, धार।
दिल के सच्चे, भले अकेले रहें,
पर ईश्वर सदा, उनके संग रहे।
आखिरी समय का, फैसला क्या होगा,
धन से नहीं, कर्म से तय होगा।
कैसा था बर्ताव, कैसे संस्कार दिए,
वही साथ जाएँगे, जो तुमने जिए।
तजुर्बा कहता है, छोटा बड़ा नहीं,
वक्त पर छोटा ही, आता है वहीं।
बड़ा आदमी अक्सर, औकात दिखा जाता,
छोटा मौके पर, काम आ जाता।
जवानी का संयम, और सही फैसला,
बुढ़ापे को देता, गरिमामय हौसला।
जो जवानी में, वक्त को खोएगा,
बुढ़ापे में वो, पछतावा बोएगा।
जवानी की मेहनत, और संस्कार सारे,
बुढ़ापे में बनते, लाठी के सहारे।
जब तक हाथ-पैर, चलते हैं प्यारे,
ज़िंदगी सिखाती, बन कर सहारे।
जब थम जाएँ कदम, थक जाए काया,
तब देती है सबक, और पुरानी छाया।
अतः जब तक साँस चले, हँसना सीख लो,
हर दर्द में भी, गुनगुनाना सीख लो।
- जगदीश प्रसाद शर्मा