"तेरी गोद मिले"
हे ईश्वर, तेरी सृष्टि कितनी सुंदर है,
घर दिया, आँगन दिया, परिवार का बंधन दिया।
प्रेम दिया, कर्तव्य का भार दिया,
और साथ में मोह का वो दर्पण दिया।
जीवन की उठल-पुथल में भटकता रहा,
कभी तुझसे दूर, कभी तेरे पास आया।
नेति नेति कहकर खुद को नकारा,
और "सोऽहम्" कहकर खुद को पाया।
हे प्रभु, अब मन थक गया झंझट-झमेले से,
अब माँगता हूँ बस तेरी दया का अनुग्रह।
दुनिया की भीड़ से दूर,
तेरी मातृत्व भरी गोद का सुख।
सिर पर रख दे वो हाथ अपना,
जिसमें वात्सल्य की शीतल छाया हो।
बाँहों में भर ले उस प्रेम से,
जिसमें कोई अपेक्षा, कोई माया न हो।
लोरी सुना दे शांति की मीठी,
जिसे सुनकर सारे प्रश्न सो जाएँ।
दे दे वो परम संतोष, वो परम आनंद,
जहाँ आकर सारे द्वंद्व खो जाएँ।
तपा दे मुझे अग्नि से,
जैसे सोना कुंदन बनता है।
जला दे सारे मोह, सारे बंधन,
ताकि मैं निर्मल, संपूर्ण बनता जाऊँ।
बना दे इतना शुद्ध, इतना पूर्ण,
कि बूंद बनकर सागर में समा जाऊँ।
न मैं रहूँ, न मेरी चाह रहे,
बस तेरे स्वरूप में विलीन हो जाऊँ।
हे प्रभु, बस इतनी कृपा करना,
जब नींद आए तो चिर निद्रा देना।
और वो निद्रा भी ऐसी देना,
जिसमें जागरण भी तू ही हो।
- जगदीश प्रसाद शर्मा