"सोच-समझकर प्रेम"
मैंने तुमसे प्रेम किया था, बहुत सोच-समझकर,
ना मोह में, ना तन्हाई में, ना बस एक लम्हे भर में।
रातें जागकर, डर से लड़कर, संदेह को हराकर,
अपने सारे टूटे सच को साहस से स्वीकारा था।
तुम्हारे सामने बिना डर के, मैं पूरी तरह खुली,
क्योंकि सच्चा प्रेम वही है जो आत्मा को निर्मल करे।
मैंने प्रेम को गहराई दी, जड़ें अपने भीतर गाड़ीं,
हर शब्द में वफ़ा बोई, हर साँस में ईमानदारी भरी।
हाथ थामना आसान नहीं, पर मैंने निभाने का वचन जाना,
कि प्रेम का अर्थ है साथ, धूप में भी और तूफां में भी।
आज भी सीख वही साथ है, जो उस प्रेम ने मुझे दी,
कि जो दिल से जिया जाए, वो कभी व्यर्थ नहीं होती।
मैं टूटी तो नहीं, और निखरी हूँ इस आग में,
क्योंकि जिसने इतना गहरा प्रेम किया, वो कमजोर कैसे हो।
अब अकेलापन भी मेरा मित्र है, शून्य भी सिखाता है,
कि पहले खुद से प्रेम करो, फिर दुनिया को अपनाता है।
कभी मिलोगे तो शिकायत नहीं, बस गर्व से कहूँगी,
मैंने प्रेम किया था सच्चा, और उस सच पर आज भी जीऊँगी।
- जगदीश प्रसाद शर्मा