विज्ञापन

सावन की सरगम

Jagdish Prasad

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सावन आया द्वार, मिट्टी ने अंगड़ाई ली, पहली बूंद पड़ी तो धरती मुस्काई।
        
                                                    
                            
सूखे आँगन में हरियाली छा गई, डाल-डाल पर खुशियों की लहर लहराई।

रस्सी के झूले बंधे आम की डाली पर, सखियों की ठिठोली गूंजे गली-गली में।
पायल की छन-छन, चूड़ी की खन-खन, धुन बजे सावन की तन-मन में।

हाथों में मेहंदी गहरा रंग लाई, हरे कंगनों से बाजू सजाई।
घेवर-फेनी की मिठास घुली हवा में, हलवाई की दुकानें सजीं पुरवाई।

हरियाली तीज पर झूले खास पड़े, रक्षाबंधन की डोर भी संग चले।
बहन बांधे धागा, भाई वचन दे, रिश्तों की मिठास और भी बढ़े।

मंदिरों में गूंजे 'ॐ नमः शिवाय', भोले पर चढ़े जल संग बेलपत्र।
सावन के सोमवार भक्तों की कतार, श्रद्धा की ज्योत जले हर एक घर।

कोयल गाए मल्हार, बादल गरजे, पवन चले तो पात-पात सरसे।
सावन के गीत पुराने पर मीठे, सुनते ही मन के तार सब हरसे।

ये मौसम नहीं, ये दिल की सरगम है, जो छू ले इसे, जीवन भर वो गम है।
सावन की सरगम बसी मन के कोने में, हर बूंद में बसी एक पुरानी अनुगूंज में।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
18 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Updesh Kumar

12614 कविताएं

View Profile

Nathuram Kaswan

8654 कविताएं

View Profile

User

29 कविताएं

View Profile

Jeewan Singh

97 कविताएं

View Profile